कहते हैं कि ऑस्ट्रेलिया बीयर पर जीने वाला देश है. 18वीं सदी के आख़िर में जब पोर्ट जैक्सन बसा था तब लोग सिर्फ़ भोजन के लिए भूखे नहीं थे बल्कि शराब की नियमित सप्लाई भी चाहते थे.
पोर्ट जैक्सन के इर्द-गिर्द ही आधुनिक सिडनी शहर विकसित हुआ है.
1796 में औपनिवेशिक व्यापारिक कंपनी कैंपबेल एंड क्लार्क ने सिडनी कोव जहाज़ को अपने बेड़े में शामिल किया था और उसे भारत के कलकत्ता से पोर्ट जैक्सन के लिए रवाना किया था.
इस जहाज़ में एल, वाइन और स्पिरिट की पेटियां भरी थीं. इसमें अनाज और इमारती लकड़ी जैसे कुछ ज़रूरी सामान भी थे. यह जहाज कभी अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच सका.
तस्मानिया के उत्तरी तट के पास प्रिज़र्वेशन आइलैंड के क़रीब यह जहाज़ डूब गया. चालक दल के लोग जो भी बचा सकते थे, उन्होंने बचाया.
225 साल बाद मैं तस्मानिया के लॉन्सेस्टन में 'क्वीन विक्टोरिया म्यूज़ियम एंड आर्ट गैलरी' में लगी सिडनी कोव के अवशेषों की प्रदर्शनी में खड़ी थी.
यह जहाज़ भले ही सिडनी तक पहुंचने में नाकाम रहा लेकिन इसमें रखी बीयर समुद्र के बर्फीले पानी में क़रीब दो सदियों तक सुरक्षित रही.
1990 के दशक में ऑस्ट्रेलिया के मरीन आर्कियोलॉजिस्ट माइक नैश की अगुवाई में चले खोजी अभियान में इसे निकाला गया और लॉन्सेस्टन के म्यूज़ियम में संरक्षित किए जाने के लिए भेज दिया गया.
अब वह बीयर फिर से तैयार है. म्यूज़ियम और ऑस्ट्रेलियाई शराब कंपनी जेम्स स्क्वाइर ने साझेदारी करके उस बीयर को फिर से बनाया है.
ख़मीर का खेल
साल 2015 में म्यूज़ियम के संरक्षक डेविड थुर्रोगुड को स्टोर रूम में रखे मलबे के संग्रह में 26 बोतलें मिली थीं. यही वह जगह है जहां मैं उनसे मिली थी.
स्टोर म्यूजियम के पीछे बना है. आधुनिक तकनीक से बनाए गए स्टोर में ऐतिहासिक संग्रह, जहाज़ के टुकड़े और उसके सामान को सफ़ेद अलमारियों पर रखा गया है.
थुर्रोगुड ने एक छोटे बक्से से बड़ी ही सावधानी से एक बोतल निकाली. उसकी सतह अपारदर्शी थी और उस पर मिट्टी लगी थी.
पत्रकारिता और केमिस्ट्री में डिग्री रखने वाले थुर्रोगुड ने बोतलों को देखने के बाद सोचा कि उनमें रखी बीयर औद्योगिक क्रांति से पहले के लोगों के रोज़मर्रा के खान-पान का प्रतिनिधित्व करती है.
अगर उसके अंदर का खमीर अभी ज़िंदा है तो इसे फिर से बनाया जा सकता है.
थुर्रोगुड को पता था कि सवा दो सौ साल पुराने खमीर से बीयर बनाने पर दुनिया भर में सुर्खियां मिलेंगी. म्यूज़ियम की फंडिंग पिछले कुछ दशकों से कम हो रही थी. ऐसे में लोगों का ध्यान खींचना बहुत अहम था.
जब हम उनके दफ़्तर में बैठे तो थुर्रोगुड ने शेल्फ से पारदर्शी कांच की नई बीयर बोतल निकाली. बोतल के अंदर जाना-पहचाना सुनहरे रंग का लिक्विड था. थुर्रोगुड ने अचानक उसे थोड़ा हिला दिया तो झाग उठ आया.
यह जहाज के मलबे से निकाली गई असली बीयर थी, जिसे म्यूज़ियम के कंज़र्वेशन डिपार्टमेंट में फिर से कल्चर किया गया था. यह साबित हो रहा था कि उसका ख़मीर अभी ज़िंदा है.
ख़मीर से ब्रेड भी बनता है. म्यूजियम के कंज़र्वेशन डिपार्टमेंट के वर्कशॉप में थुर्रोगुड एक चेस्ट फ्रीज़र के पास रुके. उन्होंने उसका ढक्कन उठाया और अंदर से तीन पावरोटियां निकालीं.
इन्हें जहाज़ में मिली बीयर के ख़मीर से बनाया गया था. उन्होंने एक पावरोटी मुझे दी. वह भारी और परतदार थी और उससे आटे की हल्की सी गंध आ रही थी.
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