रात को बारह बजे के बाद अचानक पीएसी की कई गाड़ियां आईं, अधिकारी आए, पुलिस वाले थे ही. एक पुलिसवाला हमारे पास आया और बोला कि माताजी चाबी हमें दे दीजिए. उन्होंने ये भी कहा कि हमें क्षमा कीजिएगा. तभी हम समझ गए कि कुछ गड़बड़ होने वाला है. हम लोग भी मंदिर की ओर जाने लगे, लेकिन पुलिसवाले ज़बर्दस्ती रोक दिए. बुलडोज़र लगा कर सैकड़ों साल पुराना मंदिर प्रशासन ने गिरा दिया."
कुस्मावती साहू छह महीने पहले की इस घटना को बताते-बताते रो पड़ती हैं. प्रयागराज के बैरहना मोहल्ले में अपनी छोटी सी किराने की दुकान के बाहर कुछ लोगों के साथ बैठी थीं.
कहने लगीं, "सालों से हम उस मंदिर की साफ़-सफ़ाई से लेकर पूजा-अर्चना, कीर्तन, जागरण, भंडारा कराते आ रहे हैं. मोहल्ले के सभी लोग और बाहर से भी तमाम लोग यहां दर्शन करने आते थे. हम लोगों ने अधिकारियों और पुलिसवालों से कितनी विनती की, लेकिन वो लोग ज़रा भी रहम नहीं खाए."
बैरहना चौराहा प्रयागराज शहर के काफ़ी पुराने और व्यस्त चौराहों में से एक है. चौराहे से एक सड़क मेला क्षेत्र की ओर जाती है और बाक़ी तीन सड़कें शहर के अलग-अलग हिस्सों की ओर. इसी चौराहे के एक कोने पर काली देवी का एक प्राचीन मंदिर था जिसे इसी साल जून महीने में प्रशासन ने गिरा दिया.
अब वहां मंदिर की निशानी के नाम पर सिर्फ़ पीपल का पेड़ बचा है, वो भी कब तक रहेगा, पता नहीं. मंदिर को तोड़कर वो जगह सड़क के हवाले कर दी गई. सड़क भी चौड़ी हो गई, पूरा चौराहा भी चौड़ा हो गया, चौराहे के सुंदरीकरण का काम तेज़ी से चल रहा है लेकिन मोहल्ले वालों के मुताबिक़, उनके मोहल्ले की पहचान चली गई.
बुज़ुर्गों का दर्द
बैरहना के ही रहने वाले सत्तर साल के बुज़ुर्ग राम कुमार कहते हैं, "हमारे दादा जी के बचपन से ये मंदिर था. आप समझ सकते हैं कि कितना पुराना रहा होगा. चालीस साल तो हमारे दादा जी को दिवंगत हुए ही हो गए. बैरहना ही नहीं, बल्कि शहर के प्राचीन और सिद्ध मंदिरों में से एक था ये."
प्रयागराज में स्मार्ट सिटी योजना और अगले साल जनवरी से शुरू होने वाले कुंभ मेले की वजह से पूरे शहर में सुंदरीकरण का काम हो रहा है. इसके लिए सड़कों को चौड़ा किया जा रहा है और उसी क्रम में सड़कों के किनारे आने वाले पेड़ों और मकानों के अलावा मंदिर, मस्जिद और मज़ार भी तोड़े जा रहे हैं. तेलियरगंज, बैरहना, दारागंज, सिविल लाइंस, हिम्मतगंज, ख़ुल्दाबाद समेत मुख्य मार्गों पर स्थित शायद ही कोई मोहल्ला हो जहां धर्म स्थल न ढहाए गए हों.
इनकी संख्या क्या है? प्रशासन और इलाहाबाद विकास प्राधिकरण के पास कोई पुख़्ता आंकड़ा नहीं है, लेकिन शहर के लोगों की मानें तो इनकी संख्या सैकड़ों में है और ज़िले के अधिकारी भी अनाधिकारिक रूप से इस संख्या को ढाई सौ के आस-पास बताते हैं.
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